तकनीक की तरक़्क़ी की वजह से अब ऐसी अक़्लमंद मशीनें बन रही हैं जो हमारे आस-पास की चीज़ों को न सिर्फ़ पहचान लेती हैं, बल्कि उनकी तस्वीरें भी बनाने में सक्षम हैं. जिस तरह कोई आम इंसान चित्र बनाता है उसी तरह ये बुद्धिमान मशीनें भी उन चीज़ों की तस्वीरों में उतार लेती हैं जिन्हें उन्होंने देखा होता है. हालांकि एक फ़र्क़ ज़रूर होता है. कलाकार जहां ब्रश से अपनी कृतियां गढ़ते हैं, वहीं ये अक़्लमंद मशीनें यानी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस वाली मशीनें पिक्सेल दर पिक्सेल कोई तस्वीर गढ़ते हैं. ऊपरी तौर पर मशीनों की बनाई ये तस्वीरें तो ठीक दिखती हैं. पर, क़रीब से देखें तो इनमें गड़बड़ियां साफ़ नज़र आती हैं. कैसे चीज़ें पहचानती हैं मशीनें? हमें ये कैसे पता होता है कि मकड़ी के आठ पैर होते हैं या फिर आगे बढ़ने के लिए कार के सभी टायर एक ही दिशा में होने चाहिए? इसका जवाब ये है कि हम इन सवालों के जवाब अपने आस-पास की चीज़ों को देखकर जानते हैं. हमारे दिमाग़ के न्यूरॉन दुनिया की बनावट से हमारा परिचय करवाते हैं और ये जानकारियां आंखों के ज़रिए हमारे दिमाग़ तक पहुंचती हैं. इसी तरह बुद्धिमान मशीन...
गुरुवार को सूरज की तपिश जब धीरे- धीरे तेज़ हो रही होगी, देश के कोने-कोने से आए हज़ारों किसान और खेतिहर मज़दूर दिल्ली के रामलीला मैदान में जमा हो रहे होंगे. बढ़ता क़र्ज, लागत से कम पर फ़सल का बिकना और किसानों के आत्महत्या की ख़बरें गाहे-बगाहे मीडिया में आती रहती हैं. लेकिन क्या वजह है कि किसानों को अपने हक़ के लिए बार-बार अपनी आवाज़ ऊंची करनी पड़ रही है? किसानों को दिल्ली और मुंबई कूच करना पड़ रहा है. उस दिल्ली और मुंबई में, जहां के हज़ारों बाशिंदों ने किसी किसान को उसके खेत में हल चलाते या बुआई करते हुए शायद ही कभी देखा हो. पिछले चंद महीनों में ये तीसरी बार है जब किसानों और खेतिह र मज़दूरों को राजधानी में बैठे हुक्मरानों को जगाने के लिए दिल्ली का रुख़ करना पड़ा है. 200 किसान संगठनों का प्रदर्शन 29 और 30 नवंबर को होने वाले 'किसान मुक्ति मार्च' का आयोजन 'ऑल इंडिया किसान संघर्ष समन्वय समिति'ने किया है, जिसमें 200 से अधिक किसान संगठन शामिल हैं. इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए सैकड़ों किसानों का एक जत्था दो दिनों से दिल्ली के बिजवासन में जमा था. पश्चिम बंग...