तकनीक की तरक़्क़ी की वजह से अब ऐसी अक़्लमंद मशीनें बन रही हैं जो हमारे आस-पास की चीज़ों को न सिर्फ़ पहचान लेती हैं, बल्कि उनकी तस्वीरें भी बनाने में सक्षम हैं.
जिस तरह कोई आम इंसान चित्र बनाता है उसी तरह ये बुद्धिमान मशीनें भी उन चीज़ों की तस्वीरों में उतार लेती हैं जिन्हें उन्होंने देखा होता है.
हालांकि एक फ़र्क़ ज़रूर होता है.
कलाकार जहां ब्रश से अपनी कृतियां गढ़ते हैं, वहीं ये अक़्लमंद मशीनें यानी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस वाली मशीनें पिक्सेल दर पिक्सेल कोई तस्वीर गढ़ते हैं.
ऊपरी तौर पर मशीनों की बनाई ये तस्वीरें तो ठीक दिखती हैं. पर, क़रीब से देखें तो इनमें गड़बड़ियां साफ़ नज़र आती हैं.
कैसे चीज़ें पहचानती हैं मशीनें?
हमें ये कैसे पता होता है कि मकड़ी के आठ पैर होते हैं या फिर आगे बढ़ने के लिए कार के सभी टायर एक ही दिशा में होने चाहिए?
इसका जवाब ये है कि हम इन सवालों के जवाब अपने आस-पास की चीज़ों को देखकर जानते हैं. हमारे दिमाग़ के न्यूरॉन दुनिया की बनावट से हमारा परिचय करवाते हैं और ये जानकारियां आंखों के ज़रिए हमारे दिमाग़ तक पहुंचती हैं.
इसी तरह बुद्धिमान मशीनों को भी ट्रेनिंग दी जाती है. उन्हें ढेर सारी तस्वीरें और चीज़ें दिखाई जाती हैं, ताकि वो उन्हें पहचानना सीख सकें.
मशीनों और हमारे बीच फ़र्क़ ये है कि हम कुछ तस्वीरों से ही चीज़ों को जान-पहचान जाते हैं. लेकिन, मशीनों को छोटी-छोटी चीज़ें पहचानने के लिए लाखों तस्वीरें दिखानी पड़ती हैं.
अजीबोग़रीब तस्वीरें
गूगल की कंपनी अल्फाबेट ने आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस वाली ऐसी ही एक मशीन बनाई है जिसका नाम है बिगगैन.
इसकी ख़ासियत ये है कि इसके भीतर दो दिमाग़ हैं. एक मशीनी दिमाग़ जो तस्वीरें गढ़ता है और दूसरा जो इन तस्वीरों और असली तस्वीरों में फ़र्क़ का पता लगाता है. इस पड़ताल के ज़रिए ये बुद्धिमान मशीन खुद को बेहतर बनाती है.
अमरीका की हेरिओट-वॉट यूनिवर्सिटी के कंप्यूटर वैज्ञानिक एंड्रू ब्रॉक कहते हैं, "वक़्त के साथ-साथ ये मशीनें अपने आस-पास की चीज़ों की बनावट पहचानने लगती हैं और इनकी बनाई तस्वीरें भी बेहतर होती जाती हैं."
लगातार ट्रेनिंग के बाद पिक्सेल से तस्वीरें बनाने वाली मशीनें फर या किसी खुरदरी सतह को भी परख लेती हैं. इमारतों और पंछियों की बेहतर तस्वीरें भी बनाना शुरू कर देती हैं.
लेकिन, इन अक़्लमंद मशीनों का ऊट-पटांग तस्वीरें बनाने का सिलसिला फ़िलहाल नहीं थम रहा है.
कभी पैर ग़ायब तो कभी आंखें?
एंड्रू ब्रॉक कहते हैं कि, "मशीनों की बनाई इन तस्वीरों को देखें तो लगता है कि ये फर, घास और आसमान की तस्वीरें अच्छे से बना लेते हैं. दिक़्क़त ये होती है कि ये गिनती ठीक से नहीं कर पाते. नतीजतन कारों के आठ टायर हो जाते हैं, तो परिंदों के कई पर. ये हवाई जहाज़ का पंख ही ग़ायब कर देती हैं."
यही वजह है कि ऊपरी तौर पर तो मशीनों की बनाई तस्वीरें ठीक दिखती हैं लेकिन पास से देखने पर इनकी कमियां साफ़ दिखती हैं. कभी परिंदों की तस्वीरों से पैर ग़ायब होते हैं, तो कभी आंखें.
इन मशीनों की सबसे बड़ी कमी ये है कि ये अलग-अलग एंगल से दिखने वाली तस्वीर को अच्छे से नहीं समझ पाते हैं. वहीं, इंसान का दिमाग़ इस मामले में उस्ताद होता है.
हमें अख़बार के पीछे की तस्वीर का भी अंदाज़ा हो जाता है. किसी घर को एक तरफ़ से देखकर हम दूसरी तरफ़ की तस्वीर का अनुमान लगा लेते हैं.
जिस तरह कोई आम इंसान चित्र बनाता है उसी तरह ये बुद्धिमान मशीनें भी उन चीज़ों की तस्वीरों में उतार लेती हैं जिन्हें उन्होंने देखा होता है.
हालांकि एक फ़र्क़ ज़रूर होता है.
कलाकार जहां ब्रश से अपनी कृतियां गढ़ते हैं, वहीं ये अक़्लमंद मशीनें यानी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस वाली मशीनें पिक्सेल दर पिक्सेल कोई तस्वीर गढ़ते हैं.
ऊपरी तौर पर मशीनों की बनाई ये तस्वीरें तो ठीक दिखती हैं. पर, क़रीब से देखें तो इनमें गड़बड़ियां साफ़ नज़र आती हैं.
कैसे चीज़ें पहचानती हैं मशीनें?
हमें ये कैसे पता होता है कि मकड़ी के आठ पैर होते हैं या फिर आगे बढ़ने के लिए कार के सभी टायर एक ही दिशा में होने चाहिए?
इसका जवाब ये है कि हम इन सवालों के जवाब अपने आस-पास की चीज़ों को देखकर जानते हैं. हमारे दिमाग़ के न्यूरॉन दुनिया की बनावट से हमारा परिचय करवाते हैं और ये जानकारियां आंखों के ज़रिए हमारे दिमाग़ तक पहुंचती हैं.
इसी तरह बुद्धिमान मशीनों को भी ट्रेनिंग दी जाती है. उन्हें ढेर सारी तस्वीरें और चीज़ें दिखाई जाती हैं, ताकि वो उन्हें पहचानना सीख सकें.
मशीनों और हमारे बीच फ़र्क़ ये है कि हम कुछ तस्वीरों से ही चीज़ों को जान-पहचान जाते हैं. लेकिन, मशीनों को छोटी-छोटी चीज़ें पहचानने के लिए लाखों तस्वीरें दिखानी पड़ती हैं.
अजीबोग़रीब तस्वीरें
गूगल की कंपनी अल्फाबेट ने आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस वाली ऐसी ही एक मशीन बनाई है जिसका नाम है बिगगैन.
इसकी ख़ासियत ये है कि इसके भीतर दो दिमाग़ हैं. एक मशीनी दिमाग़ जो तस्वीरें गढ़ता है और दूसरा जो इन तस्वीरों और असली तस्वीरों में फ़र्क़ का पता लगाता है. इस पड़ताल के ज़रिए ये बुद्धिमान मशीन खुद को बेहतर बनाती है.
अमरीका की हेरिओट-वॉट यूनिवर्सिटी के कंप्यूटर वैज्ञानिक एंड्रू ब्रॉक कहते हैं, "वक़्त के साथ-साथ ये मशीनें अपने आस-पास की चीज़ों की बनावट पहचानने लगती हैं और इनकी बनाई तस्वीरें भी बेहतर होती जाती हैं."
लगातार ट्रेनिंग के बाद पिक्सेल से तस्वीरें बनाने वाली मशीनें फर या किसी खुरदरी सतह को भी परख लेती हैं. इमारतों और पंछियों की बेहतर तस्वीरें भी बनाना शुरू कर देती हैं.
लेकिन, इन अक़्लमंद मशीनों का ऊट-पटांग तस्वीरें बनाने का सिलसिला फ़िलहाल नहीं थम रहा है.
कभी पैर ग़ायब तो कभी आंखें?
एंड्रू ब्रॉक कहते हैं कि, "मशीनों की बनाई इन तस्वीरों को देखें तो लगता है कि ये फर, घास और आसमान की तस्वीरें अच्छे से बना लेते हैं. दिक़्क़त ये होती है कि ये गिनती ठीक से नहीं कर पाते. नतीजतन कारों के आठ टायर हो जाते हैं, तो परिंदों के कई पर. ये हवाई जहाज़ का पंख ही ग़ायब कर देती हैं."
यही वजह है कि ऊपरी तौर पर तो मशीनों की बनाई तस्वीरें ठीक दिखती हैं लेकिन पास से देखने पर इनकी कमियां साफ़ दिखती हैं. कभी परिंदों की तस्वीरों से पैर ग़ायब होते हैं, तो कभी आंखें.
इन मशीनों की सबसे बड़ी कमी ये है कि ये अलग-अलग एंगल से दिखने वाली तस्वीर को अच्छे से नहीं समझ पाते हैं. वहीं, इंसान का दिमाग़ इस मामले में उस्ताद होता है.
हमें अख़बार के पीछे की तस्वीर का भी अंदाज़ा हो जाता है. किसी घर को एक तरफ़ से देखकर हम दूसरी तरफ़ की तस्वीर का अनुमान लगा लेते हैं.
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